ये उस दिन की बात है,
जिस दिन मुझे अपने पर गर्व हुआ,
वजह ही ऐसी थी की ऐसा होना ही था,
पुरे दिन ही न सही,
कुछ वक्त वो साथ थी मेरे,
दुनिया की सबसे अजीज,
उस दिन सबसे खूबसूरत भी थी वो,
जिसे अपनी बनाने की ख्वाहिश है मेरी,
यह जान कर भी भगवान किसी को मिलता है कहां,
उसकी सुन्दरता को बयान करू तो कैसे,
लगता है कोई शब्द ऐसा बना ही नही,
कभी लगता है किसी संगमरमर की मूर्ति थी वो,
कभी मोम की गुड़ियाँ की तरह नजर आती है वो,
जिसे छूने की इच्छा कभी होती ही नही,
वजह सिर्फ इतनी सी है कही उसे कोई नुक्शान न पहुँच जाए,
दुःख है मेरी एक छोटी सी इच्छा,
पूरी न हो सकी उस दिन,
वो इतनी सी ख्वाहिश थी,
मैं उस दिन के बाद किसी और को न देख सकूं,
उसे पाने की जिद मेरी है ही नही,
बस ख्वाहिश है इतनी मेरा दम निकले तो वो सामने हो वो मेरे,
न दुनिया में कोई अच्छा लगता है,
न बात करने को मन करता है किसी से,
वो न हो सकेगी मेरी अगर,
इस समाज परिवार व अन्य वजह से,
मैं इन सबको ही क्यों न छोड़ दू,
न रहूँगा इस दुनिया में,
न साथ जीने की ख्वाहिश होगी मेरी |
 

सिर्फ तुम:.. ख्वाहिश